रचनात्मक अभियान से प्राप्त करें पारिस्थितिक स्वाधीनता — यही हो इस खास दिन 15 अगस्त का संकल्प डॉ. अनिल मेहता पार्ट 1 15 अगस्त को हमारी चेतना में लाल किले की प्राचीर, लहराता तिरंगा, सीमाओं पर मुस्तैद सशस्त्र बल और स्वाधीनता संग्राम के महान नायकों का आत्मबलिदान स्वतः ही उभर आता है। एक और विचार , विमर्श का स्वाधीनता दिवस पर उभार जरूरी है। वह यह कि भारत की स्वतंत्रता, अखंडता और संप्रभुता की मूलभूत शक्ति उसकी राजनीतिक सीमाओं के साथ साथ पर्वतों, नदियों, घने जंगलों और विशाल जलागम, जल ग्रहण क्षेत्रों में भी निहित है। हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर राजस्थान की प्राचीन अरावली श्रृंखला तक, मध्य भारत के विंध्य-सतपुड़ा से लेकर दक्षिण के समृद्ध पश्चिमी घाट तक भारत का पर्वत तंत्र केवल भूवैज्ञानिक, भौगोलिक संरचना या पर्यटन स्थल नहीं हैं। ये हमारे राष्ट्र के प्राकृतिक दुर्ग, जल-जनक, जलवायु-नियामक, जैव-विविधता के अक्षय कोष, सतत सामाजिक -आर्थिक समृद्धि के संवाहक और हमारी बहुआयामी सभ्यता की जीवंत स्मृति हैं। हमारी नदियां इन्हीं पर्वतों और जलागमों से जन्म लेकर भारत की कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य और जनजीवन को जीवनरस प्रदान करती हैं। इनके किनारे ही हमारी अनेक सभ्यताएं, तीर्थ, नगर, व्यापारिक मार्ग और सांस्कृतिक परंपराएं विकसित हुई हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि पर्वत, नदियां और वन सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक और पारिस्थितिकीय , पर्यावरणीय विकास के आधार रहे हैं। पर्वतों ने जहां एक ओर बाहरी आक्रमणों के सामने प्राकृतिक अवरोध का कार्य किया, वहीं उनके संकरे दर्रों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामरिक नियंत्रण के प्रवेश-द्वार की भूमिका निभाई। हिंदूकुश और हिमालयी दर्रों ने उत्तर-पश्चिम से होने वाली हर ऐतिहासिक गतिविधि को प्रभावित किया। पर्वतों की घाटियों में केवल सेनाएं ही नहीं गुजरीं बल्कि विचार, भाषाएं, व्यापार, धर्म, कला और संस्कृतियां ने भी यात्रा की । किसी भी राष्ट्र की दीर्घकालिक रणनीतिक क्षमता उसकी भौगोलिक, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक अखंडता पर टिकी होती है। प्रकृति , प्राकृतिक भूगोल की रक्षा वास्तव में राष्ट्र की सामरिक क्षमता, जल सुरक्षा और सांस्कृतिक निरंतरता की रक्षा है। हिमालय केवल भारत की उत्तरी प्राकृतिक सीमा नहीं है। यह गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी प्रणालियों से जुड़े विशाल जलागमों का आधार है। यह मानसूनी हवाओं, जलवायु, हिमनदों, झरनों और पर्वतीय जल प्रणालियों को प्रभावित करता है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, कैलाश की सांस्कृतिक स्मृति, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे तीर्थ बताते हैं कि भारतीय समाज ने हिमालय को केवल भूगोल नहीं, बल्कि आस्था और आध्यात्मिक चेतना के रूप में भी देखा।इसलिए , हिमालय की रक्षा केवल सीमा सुरक्षा नहीं—जल, जलवायु और भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी है। अरावली गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैला एक प्राचीन पर्वतीय तंत्र है। यह अनेक महत्वपूर्ण जलागमों, भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों, वन्यजीव आवासों और नदी प्रणालियों से जुड़ा है। अरावली उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण अवरोध और जल-विभाजक का कार्य करती है तथा थार के मरुस्थलीय प्रभाव के पूर्व की ओर विस्तार को नियंत्रित करने में भूमिका निभाती है। अरावली पर्वतमाला भारत की उस ऐतिहासिक परंपरा का भी सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जहां प्रकृति और स्वाभिमान परस्पर एकाकार हो गए। महाराणा प्रताप और मेवाड़ के पराक्रमी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण आधार अरावली से बना मेवाड़ का दुर्गम भूगोल था। अरावली की संकरी घाटियों, वनों और दुर्गम पहाड़ियों ने मेवाड़ के योद्धाओं को प्राकृतिक सुरक्षा, आश्रय और छापामार युद्ध के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान कीं। अरावली के वनों, घाटियों और गुफाओं ने कठिन समय में आश्रय और स्थानीय संसाधनों तक पहुंच प्रदान की। वनवासी, वीर भील समुदाय ने अरावली के कोने-कोने के अपने असाधारण ज्ञान के बल पर प्रताप की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह इस बात का प्रमाण है कि जब समाज अपने प्राकृतिक भूगोल को समझता है और उसके साथ सह-अस्तित्व का संबंध बनाता है, तो वही भूगोल उसकी शक्ति बन जाता है। उसे विजय का मुकुट पहनाता है। लेकिन, जिस अरावली ने सदियों तक स्वाभिमान, स्वतंत्रता और प्रतिरोध को शरण दी, आज वही अरावली स्वयं अपने अस्तित्व के लिए रक्षा की गुहार लगा रही है। अनियोजित शहरीकरण, अवैध खनन, अंधी रिसॉर्ट संस्कृति और कंक्रीट के विस्तार ने इस प्राचीन पर्वतमाला को क्षत-विक्षत किया है। जिस पहाड़ी को हमने कभी प्राकृतिक किला माना था, उसे आज विकास के मार्ग का रोड़ा मानने की भारी भूल की जा रही है। यह अरावली के महान इतिहास, पारिस्थितिक अस्तित्व और सांस्कृतिक विरासत का घोर अपमान है। अरावली वस्तुतः एक पवित्र पारिस्थितिक क्षेत्र हैं जिसमें भूविज्ञान, वन, नदियां, झीलें, जलागम, लोककलाएं, पुरातात्विक विरासत, तीर्थ परंपराएं और जनजातीय ज्ञान का अद्भुत संगम है। भील समुदाय द्वारा किया जाने वाला गवरी अनुष्ठान प्रकृति, शक्ति, समुदाय और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध का प्रतीक है। मगरा बावजी के रूप में पहाड़ की पूजा करने की परंपरा यह दर्शाती है कि भारत की लोक चेतना में पर्यावरण संरक्षण का भाव आधुनिक कानूनों से शताब्दियों पहले से रचा-बसा था। इन परंपराओं के पीछे एक गहरी पारिस्थितिकिय , पर्यावरणीय नैतिकता - इकोलॉजिकल एथिक्स थी।पहाड़ पवित्र था, इसलिए उसे काटना अपराध था।जलस्रोत पवित्र था, इसलिए उसे प्रदूषित करना अनुचित था।वन जीवन-रेखा था, इसलिए उसका संरक्षण सामुदायिक दायित्व था।प्रकृति के प्रति श्रद्धा समाज और ईश्वर के प्रति समर्पण था। आज जब हम आधुनिक कानूनी और प्रशासनिक ढांचों के बावजूद पर्यावरण की रक्षा करने में संघर्ष कर रहे हैं, तो हमें इन लोक-परंपराओं और जनजातीय दर्शन से सीखने की महती आवश्यकता है।

