*"गुल बगिया और माली"* बरगद, नीचे शीतल कुआँ याद दिलाता नाली की ।। मन में यादें हरपल रहतीं, गुल, बगिया और माली की, मधुमय, काँटो वाला है यह जीवन पथ का मेला, भोली-भाली सूरत वाला राही रुका अकेला, बोली कितनी प्यारी लगती, उस कोयलिया काली की ।। मन में यादें हरपल........................ माली की ।।1। विकल वेदना करे प्रतीक्षा, व्याकुल निर्मल मन में, बगिया ने दे दी शीतलता, साँस बची धड़कन में, जेठ मास की टीक दुपहरी, मीत बनी हरियाली की ।। मन में यादें हरपल........................ माली की ।।2।। लगते वृक्ष मनोहर अतिशय, जो भी पात हिलाते थे, कुछ सूखे, कुछ नवल-सुकोमल, पतझड़ भी मन गाते थे, वर्षों बीते अभी महक है, उस गेंदा की डाली की ।। मन में यादें हरपल........................ माली की ।।3। मुरझाये पौधे पाले थे, उस बगिया के पानी में, सीना तान खड़े वे दरखत, अब मद-मस्त जवानी में, फल, फूलों से पेड़ लदे हैं, चिंता है रखवाली की ।। मन में यादें हरपल........................ माली की ।।4।।

