Neha Avinash Goyal Agrawal
Neha Avinash Goyal Agrawal
1mo agoJanjgir-Champa, Chhattisgarh

मेरे हर एक दिन की शुरुआत अपने प्लैनेट की फिक्र करने से प्रारंभ होती है सुबह उठते ही मैं अपने गार्डन में उन नन्हे पौधों को देखती हूं जिन्हें कल सड़कों से उठा लाया था, बर्ड फीडर देखती हूं कि उसमें से दाना पक्षियों ने खाया है कि नहीं रसोई में जाते ही नींबू से लेकर कोई भी फल काटते ही उनके बीज को एकत्रित करती हूं ताकि बीज रोपण से वृक्षारोपण तक का जो संकल्प है वह पूर्ण हो सके ।घर में होने वाले मल्टी लेयर पैकेजिंग प्लास्टिक को खाली होने पर अलग रीसाइक्लिंग के लिए एक बैग बनाया हुआ उसमें एकत्रित करती हूं। कोशिश करती हूं बाजार से कभी भी कोई गर्म खाद्य पदार्थ प्लास्टिक में ना लाया जाए इसके लिए जब भी कुछ लेने भेजती हूं तो प्लास्टिक की जगह कपड़े के थैले लेकर उसमें स्टील के बर्तनों का उपयोग करते हुए खाद्य सामग्री घर लाने कहती हू। नारियल का डाब पीने के बाद उस नारियल डाब में में पौध रोपण करती हूं जो कहीं भी सड़क के किनारे,दीवारों पर या अनवांछित जगह पर उग आते है। उन नन्हे पीपल ,नीम ,बड़ आदि के पौधों को स्नेह पूर्वक घर लाकर नारियल डाब में उनका आश्रय स्थल बनाती हूं ।अपने बच्चों को संस्कार ही धरोहर के तहत अपनी प्रकृति से प्रेम करना सिखाती हूं। जब भी वह विद्यालय जाते हैं उनके हाथ में गाय के लिए गुड और रोटी देती हूं ।उन्हें स्टील की टिफिन और बोतल ही सदैव उपयोग हेतु देती हूं उनके द्वारा भी पिछले 3 सालों से एक भी चॉकलेट चिप्स आदि के रैपर कहीं डस्टबिन में नहीं फेके गए हैं वह भी सागर मित्र बन रहे हैं पवन मित्र बन रहे हैं भूमि मित्र बन रहे हैं और अपने प्रकृति से प्रेम कर रहे हैं ।सारे पैकेट वो अपने सागर मित्र थैले में एकत्रित करते है।श्री कृष्ण का भी संपूर्ण जीवन प्रकृति प्रेम में था और हम भी उनके जीवन को अमल करते हुए अपनी प्रकृति से प्रेम करते हुए आगे बढ़ेंगे तभी हम धरती मां के आंचल में जन्म लेने के ऋण को चुका कर अपनी धरती गौ और गंगे माता को बचा पाएंगे।इन सबकी रक्षा मानव का प्रथम कर्तव्य और जिम्मेदारी है जिसे मेरी कोशिश रहती है कि मैं हर दिन हर पल अपनी ओर से सत प्रतिशत निभाने का प्रयास करूं। मेरी उम्र अभी 39 वर्ष और कुछ महीने हुए हैं मैं जीवन के अंतिम क्षण तक अपने प्रकृति के लिए जितना मुझे बन सकता है करते हुए अपने परिवार को बच्चों को समाज को और आगे जाकर के देश को भी हमेशा प्रेरित करती रहूंगी ।ईश्वर ने मनुष्य रूप में जन्म देकर यह जो प्रकृति रूपी अनमोल उपहार दिया है इसकी रक्षा हेतु हम अपना हाथ सदैव आगे बढ़ाएं ,आओ अपनी धरती अपना पर्यावरण हरा भरा स्वस्थ और सुरक्षित बनाएं। मैं चाहती हूं कि विद्यालय में जाकर बच्चों को अपनी ड्यूटी के बारे में अवेयर कर उन्हें भी सागर मित्र पवन मित्र भू मित्र बनने के लिए प्रेरित करूं उन्हें बताऊं कि उनके द्वारा फेंका गया एक छोटा सा चॉकलेट का रैपर भी किस तरीके से हमारे महासागरों में जाकर के उनमे रहने वाले जलीय जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं ।उनके लिए वह प्लास्टिक रूपी जहरीला पदार्थ मौत का कारण बन चुका है ।प्लास्टिक के रूप में छिपा विशाल दैत्य जो की भूमि की उर्वरा शक्ति को शनैः शनैः खत्म कर ही रहा है संग ही जल में रहने वाले जीव जंतुओं की मृत्यु का कारण बन चुका है ।खुले सड़कों चौक चौराहो में फेंके कचरों तो के ढेरों में प्लास्टिक में भरे खाद्य सामग्री गौ माता द्वारा खाए जाने पर उनके मौत का कारण बन रहा है प्लास्टिक के रूप में आज पशु पक्षी जीव जंतु एवं भूमि वृक्ष सभी अपने जीवन को खत्म कर पाने हेतु मजबूर हैं। और इसके जिम्मेदार हम और सिर्फ हम है।प्रकृति तो परोपकार हेतु है कल आज और कल भी।ये वृक्ष,ये हवा,ये सूर्य सभी परोपकार हेतु है और हम बस उसका देखभाल ना करके उसकी महत्ता को न समझते हुए उससे बर्बाद करने में तहस नहस करने में लगे हुए है हर दिन हर पल। जरा विचार करके देखें एक दिन भी अगर अपने जिम्मेदारी को निभामें का सूर्य को भी ना मन करे उसमें भी स्वार्थ भाव आ जाए जरा विचार करें कि इस पृथ्वी का क्या होगा। अगर यह नदियों का बहता जल बहना बंद कर दे तो क्या होगा?यह वृक्ष जिसमें सुंदर फूल बेल पत्तियां फल लगते हैं यह सब फूलना फलना बंद कर दे तो क्या होगा। यह जो स्वच्छ वायु के रूप में हमे सांसे मिल रही है ये वायु बहना बंद कर दे तो क्या होगा। बस एक पल के लिए ही हम सभी विचार करके देखें की प्रकृति भी अगर स्वार्थी हो जाए पर्यावरण भी अगर सिर्फ अपने लिए सोचने लग जाए तो हम मानवों का क्या हश्र होगा। जरा सोंच कर देखे यह जो भूस्खलन, भूकंप,बाढ़,प्रलय आदि आते हैं यह एक दिन में आने वाले प्राकृतिक आपदाएं नहीं है यह वह आपदाएं हैं जिन्हें हम ही निमंत्रण दे रहे हैं अपने दिन प्रतिदिन के दिनचर्या में किए हुए हर उसे विनाशकारी एक-एक कदमों के माध्यम से।*अति सर्वत्र वर्जयेत* कहा भी गया है हमें भी अगर कोई बार-बार धीरे-धीरे ही लेकिन निरंतर चोट पहुंचाने रहेगा तो हम एक बार सहोंगे, दो बार सहेंगे फ़िर जब क्षमता खत्म होगी और हम आक्रोशित होकर क्या करेंगे जायज़ सी बात हैसामने वाले पर प्रहार करेंगे बस वही प्रकृति करती है।तो क्या गलत है??? अपने नैतिक जिम्मेदारियां को भूलाकर किया गया हर एक कार्य पर्यावरण की सुरक्षा में ना रखा गया एक भी ध्यान और दिन प्रतिदिन अपनी दैनिक जीवनचर्या के माध्यम से हम अपनी पर्यावरण में आपदाओं का समस्याओं का निर्माण कर अपनी पैर पर हम स्वयं कुल्हाड़ी मार रहे।ना काटो मुझे बड़ा दुखता है ये हर पल हमारे वृक्षों की पुकार है।हम कहते जरूर है प्रभु कितनी सुंदर रचना तेरी कहते इसे प्रकृति मनभावन नील गगन अगन पवन और ये धरती,...पर क्या ईश्वर के इस अनमोल कृति का हम सम्मान कर पा रहे??विचार करें🙏🏻🌄💦🙏🏻🧚🏻🧉♻️🪔🚩🌳🕊️🙏🌎🐄🛍️🌱 #जीवन के रंग,सेवा के संग नेहा अविनाश अग्रवाल अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन छत्तीसगढ़ प्रदेश पर्यावरण प्रकल्प प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अग्रवाल सम्मेलन शाखा अध्यक्ष चांपा एवं एनएसपीजी जिला प्रमुख।

2 comments

No comments yet