विद्यालय प्रमुख होने के नाते मेरे मन में हमेशा एक सपना था— कुछ ऐसा करने का, जो केवल विद्यालय तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा बने। एक ऐसी पहल, जो आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश दे सके कि यदि संकल्प सच्चा हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव संभव हैं। मन में यह भावना भी थी कि जिस प्रकार विद्यालय के नन्हे-मुन्ने बच्चों को एक बहुमूल्य शिक्षा देकर एक जिम्मेदार नागरिक बनाया जाता है, उसी प्रकार प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी शिक्षा का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्योंकि सच्ची शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह मनुष्य को संवेदनशील, जागरूक और प्रकृति के प्रति उत्तरदायी बनाना भी सिखाती है। इन्हीं विचारों के साथ विद्यालय परिसर को हरियाली से भरने की यात्रा शुरू हुई। लेकिन यह मार्ग बिल्कुल आसान नहीं था। विद्यालय भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में स्थित था। चारों ओर पक्की ज़मीन, ऊपर से रेतीली और कंकड़ों वाली मिट्टी, उपजाऊ मिट्टी का अभाव और पानी की कमी— ऐसी परिस्थितियाँ थीं जहाँ पौधों का जीवित रहना ही किसी संघर्ष से कम नहीं था। कई बार यह प्रश्न सामने खड़ा हो जाता था— “जब कच्ची ज़मीन ही नहीं है, तो हरियाली लाई कहाँ से जाए?” लेकिन हमने इस चुनौती को रुकावट नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में स्वीकार किया। छोटे-छोटे प्रयासों से शुरुआत हुई। कहीं गमलों में मिट्टी भरकर पौधे लगाए गए, कहीं अनुपयोगी कोनों को जीवन देने का प्रयास किया गया। लेकिन कठिनाइयाँ यहीं समाप्त नहीं हुईं। कभी बंदरों के सामूहिक हमले पौधों को नुकसान पहुँचा देते, कभी नेवलों की उपस्थिति नई पौध को उखाड़ देती। कभी पानी की कमी पौधों को सूखा देती, तो कभी रेतीली मिट्टी उनकी जड़ों को मजबूती नहीं लेने देती थी। कई पौधे टूटे, कई सूख गए, और कई बार ऐसा लगा मानो यह सपना शायद अधूरा रह जाएगा। लेकिन हमने हार मानना नहीं सीखा। हर टूटे पौधे के साथ एक नया पौधा लगाया गया। हर असफलता के बाद उम्मीद को फिर से सींचा गया। इस पूरे प्रयास में विद्यालय के Eco Club, NSS, शिक्षकों, स्टाफ तथा SMC सदस्यों का सहयोग शक्ति बनकर साथ खड़ा रहा। सबने मिलकर केवल पौधे नहीं लगाए, बल्कि एक सोच को जीवित रखा— कि विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं, बल्कि प्रकृति और संवेदनाओं का भी घर होना चाहिए। धीरे-धीरे समय बदलने लगा। जो पौधे कभी नन्हे और कमजोर दिखाई देते थे, वही आज विशाल वृक्ष बनकर विद्यालय की पहचान बन चुके हैं। आज विद्यालय परिसर में पीपल, आम, शहतूत, अनार, अशोक और बड़े-बड़े फाइकस के वृक्ष अपनी घनी छांव से वातावरण को शीतलता प्रदान कर रहे हैं। सदाबहार, गुड़हल और मनीप्लांट जैसे पौधे हर कोने को जीवंत बना रहे हैं। विद्यालय का किचन गार्डन भी अब प्रेरणा का केंद्र बन चुका है, जहाँ भिंडी, मिर्च, बैंगन, धनिया, पुदीना, तुलसी जैसी अनेक उपयोगी वनस्पतियाँ उगाई जा रही हैं। आज यह हरियाली केवल सुंदरता नहीं है— यह संघर्षों पर मिली विजय का जीवंत प्रमाण है। यह उन हाथों की कहानी है जिन्होंने तपती धूप में पौधों को सींचा, उन उम्मीदों की कहानी है जिन्होंने कठिनाइयों के आगे झुकने से इंकार कर दिया। वैश्विक तापमान और बढ़ती गर्मी के इस दौर में यही वृक्ष विद्यालय को शीतल छांव, स्वच्छ वातावरण और जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान कर रहे हैं। जब बच्चे इन पेड़ों के नीचे बैठते हैं, पक्षियों की आवाज़ें परिसर में गूंजती हैं और हवा पत्तों से होकर गुजरती है, तब मन को एक अद्भुत संतोष मिलता है। इन वृक्षों को बढ़ते देखना वैसा ही सुकून देता है, जैसा अपने विद्यार्थियों को जीवन में आगे बढ़ते देखना। क्योंकि जैसे एक नन्हा बच्चा सही मार्गदर्शन, धैर्य और प्रेम पाकर एक जिम्मेदार नागरिक बनता है, वैसे ही ये छोटे-छोटे पौधे भी निरंतर देखभाल, संघर्ष और संरक्षण के बाद आज विशाल वृक्ष बनकर खड़े हैं। आज विद्यालय का यह हरा-भरा प्रांगण स्वयं हमारी मेहनत, धैर्य, सामूहिक प्रयास और प्रकृति प्रेम की एक जीवंत सफलता-कहानी बन चुका है— जो हर दिन यह संदेश देता है कि “यदि इरादे सच्चे हों, तो पत्थरों और रेत के बीच भी जीवन खिल उठता है।” लेखिका -पूनम मीना प्रधान चर्या सर्वोदय कन्या विद्यालय जामा मस्जिद दिल्ली ६

