
अनिल लुकड़ का "निजी जंगल"
छत्तीसगढ़ /जगदलपुर से मात्र 12 Km और रेलवे स्टेशन से मात्र 7 Km दूर, "आमाडोंगरी" नियानार के पास फैला है। यह जंगल सिर्फ पेड़ों का एक घना झुंड मात्र नहीं है। यह अनिल लुकड़ जी के अथक प्रयास, मेहनत और प्रकृति के प्रति प्रेम और धैर्य की एक जीवंत मिसाल है।वर्ष 2001 में जब यहां वृक्षारोपण की शुरुआत हो कर वर्तमान मे 30 हजार पेड़ों एवं विभिन्न पक्षियों का घर बन गया है । 7 हजार बांस, 2 हजार सागौन, 2 हजार सिवना, 18 हजार नीलगिरी, असंख्य आम, तेजपत्ता, दालचीनी जैसे सैकड़ों फलदार और औषधीय पेड़ों से भरा यह जंगल आज न केवल पर्यावरण का सहारा है, बल्कि आत्मा को सुकून देने वाली एक अद्भुत दुनिया भी है। चारों ओर हरियाली, रंग-बिरंगी तितलियाँ, पंछियों की चहचहाहट और दूर तलक फैले जंगल की शांति—यह सब किसी सपने जैसा लगता है। और इसकी खूबसूरती यहीं खत्म नहीं होती—इसके पास ही करीब 180 एकड़ का एक सुंदर बांध भी है, और जंगल के अंदर बनी कच्ची सड़कों पर आप वाहन से पूरे इलाके की सैर कर सकते हैं। यह अनिल लुकड़ के "जंगल परिवार" की सोच और 25 वर्षों की मेहनत का परिणाम है। उन्होंने एक बीज बोया, न केवल जमीन में, बल्कि उम्मीदों में भी—कि अगर हम प्रकृति को थोड़ा भी लौटाएं, तो वो हमें कई गुना लौटा देती है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन,शहरीकरण और हरियाली की कमी से जूझ रहे हैं, ऐसे में यह जगह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति से जुड़ना सिर्फ़ कर्तव्य नहीं, बल्कि एक सौभाग्य है। अब तक लगभग एक लाख से अधिक छाँवदार व फालदार पौधे लगाए है, और लगभग सभी पौधे स्थापित हो चुके हैं और उनमें से आज कई वृहद वृक्ष बन चुके है इसके अलावा विभिन्न सामजिक संगठनों के साथ कि विगत 20 वर्ष से हजारों पौधे निशुल्क वितरित कर चुके हैं ।
